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Home » जैविक कीटनाशी के लाभ
शेतीविषयक

जैविक कीटनाशी के लाभ

Neha SharmaBy Neha SharmaSeptember 6, 2023No Comments15 Mins Read
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प्रदेश में फसलों को कीटों, रोगों एवं खरपतवारों आदि से प्रति वर्ष 7 से 25 प्रतिशत की क्षति होती है जिसमें 33 प्रतिशत खरपतवारों द्वारा, 26 प्रतिशत रोगों द्वारा, 20 प्रतिशत कीटों द्वारा, 7 प्रतिशत भण्डारण के कीटों द्वारा, 6 प्रतिशत चूहों द्वारा तथा 8 प्रतिशत अन्य कारक सम्मिलित है। इस क्षति को रोकने के लिए कृषि रक्षा रसायनों का प्रयोग किया जा रहा है प्रदेश में कीटनाशकों की (टेक्निकल ग्रेड) औसत खपत 256 ग्राम प्रति हे. है जो देश के औसत खपत (टेक्निकल ग्रेड) 380 ग्राम प्रति हेक्टेयर से कम है। इस औसत खपत में 58.7 प्रतिशत कीटनाशक, 22 प्रतिशत तृणनाशक, 16 प्रतिशत फफॅूदनाशक तथा 3.3 प्रतिशत चूहानाशक एवं धूम्रक सम्मिलित है।

रसायनिक कृषि रक्षा रसायनों के प्रयोग से जहाँ कीटों, रोगों एवं खरपतवारों में सहनशक्ति पैदा हो रही है और कीटों के प्राकृतिक शत्रु (मित्र कीट) प्रभावित हो रहे है, वहीं कीटनाशकों के अवशेष खाद्य पदार्थों मिट्टी, जल एवं वायु को प्रदूषित कर रहे है। रसायनिक कीटनाशकों के हानिकारक प्रभावों से बचने के लिए जैविक कीटनाशी/जैविक एजेन्ट एवं फेरोमोन प्रपंच का प्रयोग करना नितान्त आवश्यक है जिससे पर्यावरण प्रदूषण को कम कर मनुष्य के स्वास्थ्य पर बुरा असर रोकने के साथ-साथ मित्र कीटों का भी संरक्षण होगा तथा विषमुक्त फसल, फल एवं सब्जियों का उत्पादन भी किया जा सकेगा।

जैविक कीटनाशी (बायो-पेस्टीसाइड)

जैविक रसायन (बायो-पेस्टीसाइड) फफॅूदी, बैक्टीरिया विषाणु तथा वनस्पति पर आधारित उत्पाद है जो फसलों, सब्जियों एवं फलों को कीटों एवं रोगों से सुरक्षित कर उत्पादन बढ़ाने में सहयोग प्रदान करते है जिससे स्वास्थ्य एवं पर्यावरण को कोई क्षति नहीं होती है।

जैविक एजेन्ट (बायो-एजेन्ट)

जैविक एजेन्ट (बायो-एजेण्ट्स) मुख्य रूप से परभक्षी (प्रीडेटर) यथा प्रेइंग मेन्टिस, इन्द्र गोप भृंग, ड्रोगेन फ्लाई, किशोरी मक्खी, क्रिकेट (झींगुर), ग्राउन्ड वीटिल, मिडो ग्रासहापर, वाटर वग, मिरिड वग,क्राइसोपर्ला, जाइगोग्रामा बाइकोलोराटा, मकड़ी आदि एवं परजीवी (पैरासाइट) यथा ट्राइकोग्रामा कोलिनिस, कम्पोलेटिस क्लोरिडी, एपैन्टेलिस, सिरफिड लाई, इपीरीकेनिया मेलानोल्यूका आदि कीट होते हैं, जो मित्र कीट की श्रेणी में आते हैं। उक्त कीट शत्रु कीटों एवं खरपतवार को खाते हैं। इसमें कुछ मित्र कीटों को प्रयोगशाला में पालकर खेतों में छोड़ा जाता है परन्तु कुछ कीट जिनका प्रयोगशाला स्तर पर अभी पालन सम्भव नहीं हो पाया है, उनको खेत/फसल वातावरण में संरक्षित किया जा रहा है। वस्तुतः मकड़ी कीट वर्ग में नहीं आता है लेकिन परभक्षी होने के कारण मित्र की श्रेणी में आता है। बायो-एजेण्ट्स कीटनाशी अधिनियम में पंजीकृत नहीं है तथा इनकी गुणवत्ता, गुण नियंत्रण प्रयोगशाला द्वारा सुनिश्चित नहीं की जा सकती है।

जैविक कीटनाशी के लाभ

  1. जीवों एवं वनस्पतियों पर आधारित उत्पाद होने के कारण जैविक कीटनाशी भूमि में अपघटित हो जाते हैं तथा इनका कोई भी अंश अवशेष नहीं रहता है। यही कारण कि इन्हें पारिस्थितिकीय मित्र के रूप में जाना जाता है।
  2. जैविक कीटनाशी केवल लक्षित कीटों एवं रोगों को प्रभावित करते हैं जबकि रासायनिक कृषि रक्षा रसायनों से मित्र कीट भी नष्ट हो जाते हैं।
  3. जैविक कीटनाशकों के प्रयोग से कीटों/रोगों में सहनशीलता एवं प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न नहीं होता है, जबकि अनेक रासायनिक कृषि रक्षा रसायनों से कीटों, रोगों एवं खरपतवारों में प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न होती जा रही है, जिनके कारण उनका प्रयोग अनुपयोगी होता जा रहा है।
  4. जैविक कीटनाशकों के प्रयोग से कीटों के स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं होता है। जबकि रासायनिक कीटनाशकों के प्रयोग से कीटों के स्वाभाव में परिवर्तन होता है।
  5. जैविक कीटनाशकों के प्रयोग के तुरन्त बाद फलों, सब्जियों आदि को खाने के प्रयोग में लाया जा सकता है, जबकि रासायनिक कीटनाशकों के अवशिष्ट प्रभाव को कम करने के लिए कुछ दिनों की प्रतीक्षा करनी पड़ती है।
  6. जैविक कीटनाशकों के सुरक्षित हानि रहित एवं पारिस्थितिकीय मित्र होने के कारण विश्व में इनके प्रयोग से उत्पादित चाय, कपास, फल, सब्जियॉ, तम्बाकू, खाद्यान, दलहन एवं तिलहन की मांग एवं मूल्यों में वृद्धि हो रही है, जिससे कृषकों को उनके उत्पादों का अधिक मूल्य मिल रहा है।
  7. जैविक कीटनाशक, पर्यावरण, मनुष्य एवं पशुओं के लिए सुरक्षित तथा हानि रहित है। इनके प्रयोग से जैविक खेती को बढ़ावा मिल रहा है। जो पर्यावरण प्रदूषण को कम करने एवं पारिस्थितिकीय संतुलन को बनाये रखने में सहायक है।

 जैविक कीटनाशी (बायो-पेस्टीसाइड)

 ट्राइकोडरमा विरिडी/ट्राइकोडरमा हारजिएनम

ट्राइकोडरमा फफूंदी पर आधारित घुलनशील जैविक फफॅूदीनाशक है। ट्राइकोडरमा विरडी 1%W.P., 1-15%W.P., तथा ट्राइकोडरमा हारजिएनम 2% W.P. के फार्मुलेशन में उपलब्ध है। ट्राइकोडरमा विभिन्न प्रकार के फसलों, फलों एवं सब्जियों में जड़, सड़न, तना सड़न डैम्पिंग आफ, उकठा, झुलसा आदि फफॅूदजनित रोगों में लाभप्रद पाया गया है। धान, गेंहूँ, दलहनी फसलें गन्ना, कपास, सब्जियों, फलों आदि के रोगों का यह प्रभावी रोकथाम करता है। ट्राइकोडरमा के कवक तंतु हानिकारक फफूंदी के कवकतंतुओं को लपेट कर या सीधे अन्दर घुसकर उसका रस चूस लेते हैं। इसके अतिरिक्त भोजन स्पर्धा के द्वारा कुछ ऐसे विषाक्त पदार्थ का स्त्राव करते हैं, जो बीजों के चारों ओर सुरक्षा दीवार बनाकर हानिकारक फफूंदी से सुरक्षा देते हैं। ट्राइकोडरमा के प्रयोग से बीजों का अंकुरण अच्छा होता है तथा फसलें फफूंदजनित रोगों से मुक्त रहती हैं। नर्सरी में ट्राइकोडरमा का प्रयोग करने पर जमाव एवं वृद्धि अच्छी होती है। ट्राइकोडरमा के प्रयोग से पहले एवं बाद में रासायनिक फफूंदीनाशक का प्रयोग नहीं करना चाहिए। ट्राइकोडरमा की सेल्फ लाइफ सामान्य तापक्रम पर एक वर्ष है।

ट्राइकोडरमा के प्रयोग की विधि

  1. बीज शोधन हेतु 4 ग्राम ट्राइकोडरमा प्रति किग्रा. बीज दर से शुष्क बीजोपचार कर बुवाई करना चाहिए।
  2. कन्द एवं नर्सरी पौध उपचार हेतु 5 ग्राम ट्राइकोडरमा प्रति लीटर पानी की दर से घोलकर उसमें कन्द एवं नर्सरी के पौधों की जड़ को शोधित कर बुवाई/रोपाई करना चाहिए।
  3. भूमि शोधन हेतु 2.5 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर ट्राइकोडरमा को लगभग 75 कि.ग्रा. गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छीटा देकर 8-10 दिन तक छाया में रखने के उपरान्त बुवाई से पूर्व आखिरी जुताई पर भूमि में मिला देना चाहिए।
  4. बहुवर्षीय पेड़ों के जड़ के चारों तरफ 1-2 फीट चौड़ा एवं 2-3 फीट गहरा गड्ढ़ा पौधे की कैनोपी के अनुसार खोदकर प्रति पौधा 100 ग्राम ट्राइकोडरमा को 8-10 कि.ग्रा. गोबर की खाद में मिलाकर 8-10 दिन बाद तैयार ट्राइकोडरमा युक्त् गोबर की खाद को मिट्टी में मिलाकर गड्ढ़ों की भराई करनी चाहिए।
  5. खड़ी फसल में फफूँदीजनित रोग के नियंत्रण हेतु 2.5 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से 400-500 लीटर पानी में घोलकर सायंकाल छिड़काव करें जिसे आवश्यकतानुसार 15 दिन के अंतराल पर दोहराया जा सकता है।

 ब्यूवेरिया बैसियाना

ब्यूवेरिया बैसियाना फफूँद पर आधारित जैविक कीटनाशक है। ब्यूवेरिया बैसियाना 1% WP, एवं 1-15% W.P के फार्मुलेशन में उपलब्ध है जो विभिन्न प्रकार के फसलों, फूलों एवं सब्जियों में लगने वाले फलीबेधक, पत्ती लपेटक, पत्ती खाने वाले कीट, चूसने वाले कीटों, भूमि में दीमक एवं सफेद गिडार आदि की रोकथाम के लिए लाभकारी हैं। ब्यूवेरिया बैसियाना अधिक आर्द्रता एवं कम तापक्रम पर अधिक प्रभावी होता है। ब्यूवेरिया बैसियाना के प्रयोग से पहले एवं बाद में रासायनिक फफूंदीनाशक का प्रयोग नहीं करना चाहिए। ब्यूवेरिया बैसियाना की सेल्फ लाइफ एक वर्ष है।

ब्यूवेरिया वैसियाना के प्रयोग की विधि

  1. भूमि शोधन हेतु ब्यूवैरिया वैसियाना की 2.5 किग्रा. प्रति हे. लगभग 75 किग्रा. गोबर की खाद में मिलाकर अन्तिम जुताई के समय प्रयोग करना चाहिए।
  2. खड़ी फसल में कीट नियंत्रण हेतु 2.5 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से 400-500 लीटर पानी में घोलकर सायंकाल छिड़काव करें जिसे आवश्यकतानुसार 15 दिन के अंतराल पर दोहराया जा सकता है।

 स्यूडोमोनास फ्लोरिसेन्स

स्यूडोमोनास फ्लोरिसेन्स बैक्टीरिया पर आधारित जैविक फफूंदीनाशक/ जीवाणुनाशक है। स्यूडोमोनास फ्लोरिसेन्स 5% WP के फार्मुलेशन में उपलब्ध है जो विभिन्न प्रकार के फसलों, फलों, सब्जियों एवं गन्ना में जड़ सड़न, तना सड़न डैम्पिंग आफ, उकठा, लाल सड़न, जीवाणु झुलसा, जीवाणुधारी आदि फफूँदजनित एवं जीवाणुजनित रोगों के नियंत्रण के लिए प्रभावी पाया गया है। स्यूडोमोनास के प्रयोग के 15 दिन पूर्व या बाद में रासायनिक बैक्टेरीसाइड का प्रयोग नहीं करना चाहिए। स्यूडोमोनास फ्लोरिसेन्स की सेल्फ लाइफ एक वर्ष है।

स्यूडोमोनास फ्लोरिसेन्स के प्रयोग की विधि

  1. बीज शोधन हेतु 10 ग्राम स्यूडोमोनास को 15-20 मि.ली. पानी में मिलाकर गाढ़ा घोल (स्लरी) तैयार करके एक किग्रा. बीज को उपचारित कर छाया में सुखाने के उपरान्त बुवाई करना चाहिए।
  2. नर्सरी पौध उपचार हेतु 50 ग्राम स्यूडोमोनास को 1 लीटर पानी की दर से घोल (स्लरी) तैयार कर पौध उपचार अथवा एक वर्ग मी. क्षेत्रफल के क्यारियों में छिड़काव करना चाहिए जिससे भूमि जनित रोगों से बचाव किया जा सकता है।
  3. भूमि शोधन हेतु 2.5 किग्रा. स्यूडोमोनास प्रति हेक्टेयर 10-20 किग्रा. महीन पिसी हुई बालू में मिलाकर बुवाई/रोपाई से पूर्व उर्वरकों की तरह छिड़काव करना लाभप्रद होता है। 2.5 किग्रा. स्यूडोमोनास को 100 किग्रा. गोबर की खाद में मिलाकर लगभग 5 दिन रखने के उपरान्त बुवाई से पूर्व भूमि में मिलाया जा सकता है।

मेटाराइजियम एनिसोप्ली

मेटाराइजियम एनिसोप्ली फफूँद पर आधारित जैविक कीटनाशक है। मेटाराइजियम एनिसोप्ली 1-15% W.P. एवं 1-5% W.P. के फार्मुलेशन में उपलब्ध है जो विभिन्न प्रकार के फसलों, फलों एवं सब्जियों में लगने वाले फलीबेधक, पत्ती लपेटक, पत्ती खाने वाले कीट, चूसने वाले कीट, भूमि में दीमक एवं सफेद गिडार आदि के रोकथाम के लिए लाभकारी हैं। मेटाराइजियम एनिसोप्ली कम आर्द्रता एवं अधिक तापक्रम पर अधिक प्रभावी होता है। मेटाराइजियम एनिसोप्ली के प्रयोग से 15 दिन पहले एवं बाद में रासायनिक फफूंदीनाशक का प्रयोग नहीं करना चाहिए। मेटाराइजियम एनिसोप्ली की सेल्फ लाइफ एक वर्ष है।

मेटाराइजियम एनिसोप्ली के प्रयोग की विधि

  1. भूमि शोधन हेतु मेटाराइजियम एनिसोप्ली की 2.5 किग्रा. प्रति हे. लगभग 75 किग्रा. गोबर की खाद में मिलाकर अन्तिम जुताई के समय प्रयोग करना चाहिए।
  2. खड़ी फसल में कीट नियंत्रण हेतु 2.5 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से 400-500 लीटर पानी में घोलकर सायंकाल छिड़काव करें जिसे आवश्यकतानुसार 15 दिन के अंतराल पर दोहराया जा सकता है।

वर्टीसीलियम लैकानी

  1. सीलियम लैकानी फफूँद पर आधारित जैविक कीटनाशक है। वर्टीसीलियम लैकानी 1-15% W.P के फार्मुलेशन में उपलब्ध है जो विभिन्न प्रकार के फसलों में चूसने वाले कीटों यथा सल्क कीट, माहू, थ्रिप्स, जैसिड, मिलीबग आदि के रोकथाम के लिए लाभकारी हैं। वर्टीसीलियम लैकानी के प्रयोग के 15 दिन पहले एवं बाद में रासायनिक फफूंदीनाशक का प्रयोग नहीं करना चाहिए। वर्टीसीलियम लैकानी की सेल्फ लाइफ एक वर्ष है।

वर्टीसीलियम लैकानी के प्रयोग की विधि

1. खड़ी फसल में कीट नियंत्रण हेतु 2.5 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से 400-500 लीटर पानी में घोलकर आवश्यकतानुसार 15 दिन के अंतराल पर सांयकाल छिड़काव करना चाहिए।

 बैसिलस थूरिजियेन्सिस (बी.टी.)

बैसिलस थूरिनजियेन्सिस बैक्टीरिया पर आधारित जैविक कीटनाशक है। बैसिलस थूरिनजियेन्सिस प्रजाति कर्सटकी, 5% डब्लू.पी. विभिन्न प्रकार के फसलों, सब्जियों एवं फलों में लगने वाले लेपिडोप्टेरा कुल के फली बेधक, पत्ती लपेटक, पत्ती खाने वाले कीटों की रोकथाम के लिए लाभकारी है। बैसिलस थूरिनजियेन्सिस के प्रयोग के 15 दिन पूर्व या बाद में रासायनिक बैक्टेरीसाइड का प्रयोग नहीं करना चाहिए। बैसिलस थूरिनजियेन्सिस की सेल्फ लाइफ एक वर्ष है।

बैसिलस थूरिनजियेन्सिस के प्रयोग की विधि

1. खड़ी फसल में कीट नियंत्रण हेतु 0.5-1.0 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से 400-500 लीटर पानी में घोलकर आवश्यकतानुसार 15 दिन के अंतराल पर सायंकाल छिड़काव करना चाहिए।

 न्यूक्लियर पालीहेड्रोसिस वायरस (एन.पी.वी.)

एन.पी.वी. वाइरस पर आधरित जैविक कीटनाशक है, जा चना की सूंडी एवं तम्बाकू की सूंडी के नियंत्रण के लिए प्रयोग में लाया जाता है। चने की सूंडी के बना हुआ जैविक कीटनाशक 2% A.S. एवं तम्बाकू की सूंडी से बना हुआ जैविक कीटनाशक 0-5% A.S. के फार्मुलेशन में उपलब्ध है। चने की सूंडी से बना हुआ एन.पी.वी. चने की सूंडी पर ही काम करता है। कीट की सूंडी के द्वारा वाइरस युक्त पत्ती या फली खाने के 3 दिन बाद सूंडियों का शरीर पीला पड़ने लगता है तथा एक सप्ताह बाद सूंडियॉ काले रंग की हो जाती है तथा शरीर के अन्दर द्रव भर जाता है। रोगग्रस्त सूंडियॉ पौधे की ऊपरी पत्तियों अथवा टहनियों पर उल्टी लटकी हुई पायी जाती है। एन.पी.वी. की सेल्फ लाइफ एक वर्ष है।

न्यूक्लियर पालीहेड्रोसिस वायरस के प्रयोग की विधि

1. खड़ी फसल में कीट नियंत्रण हेतु 250-300 लारवा के समतुल्य (एल.ई.) प्रति हेक्टेयर की दर से 400-500 लीटर पानी में घोलकर आवश्यकतानुसार 15 दिन के अंतराल पर सांयकाल छिड़काव करना चाहिए।

 एजाडिरेक्टिन (नीम आयल)

एजाडिरेक्टिन वनस्पति पर आधरित वानस्पति कीटनाशक है। एजाडिरेक्टिन 0.03,0.15,0.3,0.5,1.0 एवं 5% E.C. के फार्मुलेशन में उपलब्ध हैं एजाडिरेक्टिन विभिन्न प्रकार के फसलों, सब्जियों एवं फलों में पत्ती खाने वाले, पत्ती लपेटने वाले, चूसने वाले, फली बेधक आदि कीटों के नियंत्रण के लिए प्रभावी है। इसके प्रयोग से कीटों में खाने की अनिक्षा उत्पन्न करती है तथा कीटों को दूर भगाती है। अण्डों से सूंडियॉ निकलने के तुरन्त बाद इसका छिड़काव करना अधिक लाभकारी होता है। एजाडिरेक्टिन की सेल्फ लाइफ एक वर्ष है।

एजाडिरेक्टिन के प्रयोग की विधि

खड़ी फसल में कीट नियंत्रण अथवा कीट के प्रयोग से पूर्व सुरक्षात्मक नियंत्रण हेतु एजाडिरेक्टिन 0.15% E.C. की 2.5 ली. मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 500-600 लीटर पानी में घोलकर आवश्यकतानुसार 15 दिन के अंतराल पर सायंकाल छिड़काव करना चाहिए।

 जैविक एजेण्ट (परजीवी एवं परभक्षी)

 ट्राइकोग्रामा कोलिनिस

ट्राइकोग्रामा कोलिनिस अण्ड परजीवी छोटी ततैया होती है। मादा ततैया अपने अण्डे को हानिकारक कीटों के अण्डों में डाल देती है। अण्डों के अन्दर ही पूरा जीवन चक्र पूरा होता है। प्रौढ़ ततैया अण्डे में छेद कर बाहर निकलता है। इसका जीवन चक्र निम्न प्रकार है।

अण्डा अवधि 16-24 घण्टे
लारवा अवधि 2-3 दिन
प्यूपा अवधि 2-3 दिन
पूर्ण जीवन चक्र 8-10 दिन (गर्मी)
9-12 दिन (जाड़ा)

ट्राइकोग्रामा की पूर्ति कार्ड के रूप में होती है। एक कार्ड की लम्बाई 6 इंच तथा चौड़ाई 1 इंच होती है जिसमें लगभग 20000 अण्ड परजीवी होते हैं। ट्राइकोग्रामा विभिन्न प्रकार के फसलों, सब्जियों एवं फलों के हानिकारक कीटों, जो पौधे की पत्तियों, कलियों तथा टहनियों आदि के बाहरी भाग पर अण्डे देते है, के अण्डों को जैविक विधि से नष्ट करने हेतु प्रयोग किया जाता है।

ट्राइकोग्रामा कोलिनिस (ट्राइकोग्रमा कार्ड) के प्रयोग की विधि

ट्राइकोग्रामा कार्ड को विभिन्न फसलों में एक सप्ताह के अन्तराल पर 3-4 बार लगाया जाता है। खेतों में हानिकारक कीटों के अण्डे दिखाई देते ही ट्राइकोकार्ड को छोटे-छोटे 4-5 सामान टुकड़ों में काट कर खेत के विभिन्न भागों में पत्तियों की निचली सतह पर धागें से बॉध दे। सामान्य फसलों में 5 कार्ड किन्तु बड़ी फसलों जैसे गन्ने में 10 कार्ड प्रति हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिए। ट्राइकोग्राम कार्ड को सायंकाल खेत में लगाया जाय लेकिन इसके उपयोग से पहले, उपयोग के समय तथा बाद में खेत में रसायनिक कीटनाशक का छिड़काव नहीं करना चाहिए। ट्राइकोग्रामा कार्ड को बर्फ के डिब्बे या रेफ्रिजरेटर में रख कर जीवन चक्र लगभग 15 दिन तक और बढ़ाया जा सकता है।

क्राइसोपर्ला

क्राइसोपर्ला एक परभक्षी कीट है इस कीट का लारवा, सफेद मक्खी,मॉहू, फुदका, थ्रिप्स आदि के अण्डों एवं शिशु को खा जाता है। क्राइसोपर्ला के अण्डों को कोरसियेरा के अण्डों के साथ लकड़ी के बुरादायुक्त बाक्स में आपूर्ति किया जाता है क्राइसोपर्ला का लारवा कोरसियेरा के अण्डों को खाकर प्रौढ़ बनते है। इसका जीवन चक्र निम्न प्रकार है।

अण्डा अवधि 3-4 दिन
लारवा अवधि 11-13 दिन
प्यूपा अवधि 5-7 दिन
पूर्ण जीवन चक्र 19-24 दिन

क्राइसोपर्ला के प्रयोग की विधि

विभिन्न फसलों एवं सब्जियों में क्राइसोपर्ला के 50000-100000 लारवा या 500-1000 प्रौढ़ प्रति हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिए। सामान्यतयाः इन्हें 2 बार छोड़ना चाहिए।

जाइगोग्रामा वाइकोलोराटा

जाइगोग्रामा वाइकोलोराटा गाजर घास का परभक्षी कीट है। इस कीट का प्रौढ़ एवं गिडार गाजर घास की पत्ती एवं फूल को खा जाते है। इस कीट को जुलाई -अगस्त के महीने में गाजर घास पर छोड़ने से उसको खाकर पूरी नष्ट कर देते है। इस कीट पर नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय फैजाबाद एवं राष्ट्रीय खरपतवार शोध केन्द्र, जबलपुर में शोध कार्य किया जा रहा है।

अन्य परभक्षी कीट

प्रेइंग मेन्टिस, इन्द्र गोप भृंग, ड्रोगेन लाई, किशोरी मक्खी, क्रिकेट (झींगुर), ग्राउन्ड वीटिल, रोल वीटिल, मिडो ग्रासहापर, वाटर वग, मिरिड वग आदि फसलों, सब्जियों आदि के खेतों में पाये जाते है जो हानिकारक कीटों के लारवा, शिशु एवं प्रौढ़ को प्राकृतिक रूप से खाकर नियंत्रण करते है। इन मित्र कीटों को संरक्षित करना चाहिए तथा खेतों में शत्रु एवं मित्र कीट का अनुपात 2:1 हो तो कीटनाशकों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

 परभक्षी मकड़ी

भेडिया मकडी, चार जबडे वाली मकडी, बौनी मकडी, थैली वाली मकडी, गोल मकडी, हली बग मकड़ी, गोलाकार मकड़ी, कूदने वाली मकड़ी धान के खेतों में पायी जाती है जो विभिन्न प्रकार के फुदकों, मैगेट, पत्ती लपेटक आदि कीटों के शिशु, लारवा एवं प्रौढ़ को खाकर प्राकृतिक रूप से नियंत्रण करते है। इन कीटों को संरक्षित करना चाहिए।

अन्य परजीवी कीट

सिरफिड लाई, कम्पोलेटिस क्लोरिडी, ब्रैकन, अपेन्टेलिस, इपीरीकेनिया मेलानोल्यूका आदि परजीवी कीट विभिन्न प्रकार के फसलों, सब्जियों एवं गन्ना के खेतों में पाये जाने वाले कीटों के लारवा, शिशु एवं प्रौढ़ को अन्दर ही अन्दर खाकर प्राकृतिक रूप से कीट का नियंत्रण करते है। इस मित्र परजीवी कीटों का संरक्षण करना चाहिए।

 गंधपाश (फेरोमोन ट्रैप)

फेरोमोन ट्रैप फसलों को क्षति पहुँचाने वाले सूडियों के नर पतंगों को फॅसाने के लिए प्रयोग किया जाता है। ट्रैप प्लास्टिक का बना होता है जिसमें कीप के आकार के मुख्य भाग पर लगे ढ़क्कन के मध्य में मादा कीट की गंधयुक्त ल्यूर लगाया जाता है जो नर पतंगों को आकर्षित करता है। कीप के निचले भाग पर पालीथीन की थैली लगायी जाती है जिसमें नर पतंगे फॅस जाते है। थैली के निचले मुख पर रबड़ बैण्ड हटाकर फॅसे पतंगों को मार कर निकाल दिया जाता है। ल्यूर विभिन्न प्रकार के नर कीटों को आकर्षित करने के लिए अलग-अलग गंध का बना होता है। चने का फली बेधक कीट, तम्बाकू कीट, भिड्डी का चित्तीदार कीट, कपास का गुलाबी कीट, धान का तना बेधक, बैंगन का फली व कलंकी बेधक, फल की मक्खी कीटों के प्रौढ़ को पकड़ने के लिए ल्यूर उपलब्ध है।

गंधपाश के प्रयोग की विधि

फेरोमोन ट्रैप को फसल की उॅचाई से लगभग 2 फीट ऊपर रखते हुए लकड़ी के गडे हुए डन्डे में ट्रैप के हत्थे को बॉध देते है। ल्यूर को बन्द थैली से निकालकर ट्रैप के ढक्कन में बने स्थान पर लगाया जाता है। बन्द थैली से निकाल कर ट्रैप में लगाने के बाद ल्यूर को 25 दिन बाद पुनः बदल देते है। हानिकारक पतंगों की उपस्थिति का पता करने के लिए 5-6 ट्रैप तथा अधिक से अधिक संख्या में नर कीट पतंगों को पकड़ने के लिए 15-20 ट्रैप प्रति हेक्टेयर दर से लगाया जाता है। फल की मक्खी के लिए बोतल ट्रैप कर सूक्ष्म फल मक्खी ट्रैप का प्रयोग किया जाता है।

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