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Home » खेती और पशुपालन बनेगा फायदे का सौदा
पशु पालन

खेती और पशुपालन बनेगा फायदे का सौदा

Neha SharmaBy Neha SharmaNovember 6, 2023No Comments6 Mins Read
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नवंबर महीना शुरू हो चुका है. ऐसे में प्रसार शिक्षा निदेशालय, चौधरी सरवण कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर के वैज्ञानिकों ने किसानों के लिए नवंबर माह के पहले पखवाड़े यानी की अगले 15 दिनों के दौरान में किए जाने वाले कृषि और पशुपालन से संबंधित कार्यों को सुचारू रूप से करने के लिए सलाह जारी कर दी गई है. ताकि किसान इन कार्यों को करके अपनी आय को बढ़ा सकें. बता दें कि कृषि वैज्ञानिकों के द्वारा जारी की गई सलाह में फसल उत्पादन, मसर, सब्जी उत्पादन, फसल संरक्षण और पशुधन आदि के बारे में बताया गया है.

ऐसे में आइए जानते हैं कि नवंबर माह में अगले 15 दिनों के दौरान किसान खेती-बाड़ी व पशुपालन से संबंधित किन बातों का ध्यान रखें.
अगले 15 दिनों के दौरान किसान इन बातों का रखें ध्यान
फसल उत्पादन
हिमाचल प्रदेश में गेहूं रबी मौसम की मुख्य फसल है. ऐसे में गेहूं की शुरुआती फसल को ठंडा वातावरण की आवश्यकता पड़ती है. अगर वातावरण शुरू में गर्म है, तो फसल की जड़ कम बनती है और साथ ही इसमें बीमारियां लगने की भी संभावना अधिक बढ़ जाती है. वहीं, निचले एवं मध्यवर्ती क्षेत्रों के किसान नवम्बर माह के प्रथम पखवाड़े में गेहूं की एच.पी.डब्ल्यू-155, एच.पी.डब्ल्यू-236, वी.एल.-907, एच.एस.507, एच.एस.562, एच.पी. डब्ल्यू-349, ऐच.पी.डब्ल्यू-249 व एच.पी.डब्ल्यू-368. किस्मों को अपने खेत में लगाना चाहिए. इसके अलावा निचले क्षेत्रों के किसान गेहूं की एच.डी. -3086. डी. पी. डब्ल्यू- 621-50-595, व एच.डी.-2687 किस्में लगाएं. किसान को बिजाई के लिए रैक्सिल 1 ग्राम/कि.ग्रा बीज अथवा बाविस्टिन या विटावेक्स 2.5 ग्राम/किग्रा. बीज से उपचारित बीज का इस्तेमाल करना चाहिए.

बता दें कि गेहूं की बिजाई सितम्बर माह के अंत या फिर अक्टूबर माह के आरंभ में की गई हो और खरपतवारों के पौधे 2-3 पत्तों की अवस्था, बिजाई के 35 से 40 दिनों बाद में हो तो इस समय गेहूं में खरपतवार नाशक रसायनों के छिड़काव अवश्य करें. आइसोप्रोट्यूरॉन 75 डब्ल्यू.पी. 70 किग्रा दवाई या वेस्टा 16 ग्राम एक कनाल के लिए पर्याप्त होती है. छिड़काव के लिए 30 लीटर पानी प्रति कनाल के हिसाब से प्रयोग करें.

मसर
किसान मसर की विपाशा, एच.पी.एल.-5 व मारकंडे ई.सी.1 किस्मों की बुवाई नवंबर के प्रथम पखवाड़े तक कर लें. यह फसल बरसात के बाद भूमि में बची नमी के द्वारा भी उगाई जा सकती है. बीज की मात्रा 25-30 किग्रा. प्रति हेक्टेयर रखें. पछेती बिजाई के लिए बीज की मात्रा अधिक रखनी चाहिए. फसल को केरा विधि से 25-30 सेमी की दूरी पर पंक्तियों में बीज रखें.

सब्जी उत्पादन
हिमाचल प्रदेश के निचले एवं मध्यवर्ती पहाड़ी क्षेत्रों में प्याज की सुधरी प्रजातियों जैसे पटना रैड, नासिक रेड, पालम लोहित, पूसा रैड ए.एफ.डी.आर. ए.एफ.एल.आर. और संकर किस्में इत्यादि की पनीरी दें. इंडोफिल एम-45 तथा 10-15 ग्रा. कीटनाशक थाइमेट या फॉलीडॉल धूल 5 सें.मी. मिट्टी की उपरी सतह में मिलाने के उपरान्त 5 सें.मी. पंक्तियों की दूरी पर बीज की पतली बिजाई करें. बिजाई से पहले बीज का उपचार वैविस्टीन 2.5 ग्राम/कि.ग्रा. बीज से अवश्य करें.

वहीं, इन्हीं क्षेत्रों में लहसुन की सुधरी प्रजातियों जी. एच.सी. 1. एग्रीफाउंड पार्वती की बिजाई पंक्तियों में 20 से.मी पौधे में 10 सेमी . की दूरी पर करें. बिजाई से पहले 200-250 क्विंटल गोबर की गली सड़ी खाद के अतिरिक्त 235 कि.ग्रा. मिश्रण 12:32:16 खाद तथा 37 कि. ग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश प्रति हेक्टेयर खेतों में डालें.

मटर की सुधरी प्रजातियों जैसे पालम समूल,पी.वी.-89, जी.एस.10 आजाद पी. -1 एवं आजाद पी.-3 की बिजाई 45 सेमी कतारों तथा 10 सेमी पौधे से पौध की दूरी पर करें. बिजाई से पहले 200 क्विंटल गोबर की गली सड़ी खाद के अतिरिक्त 187 किग्रा. मिश्रण 12:32:16 खाद, 50 कि. ग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश तथा 50 किलोग्राम यूरिया प्रति हेक्टेयर खेतों में डालें. लाइन की दूरी 45 सेमी तथा पौधों में 10 सेंटीमीटर की दूरी बनाए रखें.

फूलगोभी, बंदगोभी, ब्रोकली, चाइनीज सरसों इत्यादि की रोपाई 45-50 सेंटीमीटर पंक्ति से पंक्ति तथा 30-45 सेंटीमीटर पौधे से पौधे की दूरी पर करें. पालक, लैट्यूस, मेथी, धनिया व क्यूं वाकला आदि को भी लगाने / बोने का यह उचित समय है. रोपाई से पूर्व 100 क्विंटल गोबर की गली सड़ी खाद के अतिरिक्त 185 कि.ग्रा. मिश्रण 12:32:16 खाद तथा 30-40 किग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से खेतों में डालें.

खेतों में पहले से लगी सब्जियों में 10 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करें. फिर निराई-गुड़ाई करें और नत्रजन 40-50 किग्रा. यूरिया प्रति हेक्टेयर खेतों में डालें.
फसल संरक्षण
बारानी क्षेत्रों की मिट्टी में पाये जाने वाले कीटों जैसे कि सफेद सुंडी कटुआ कीट तथा दीमक आदि का अत्याधिक प्रकोप होता है, वहां गेहूं, चना, मटर आदि की बिजाई से पहले क्लोरपायरीफास 20 ई. सी 2 लीटर रसायन को 25 किलोग्राम रेत में मिलाकर प्रति हेक्टेयर खेत में छिड़काव करें. गोभी वर्गीय सब्जियों की पौध लगाने से पहले कटुआ कीट से प्रभावित खेतों में भी उपरोक्त कीटनाशक का चयन करना चाहिए.

सरसों वर्गीय फसलों में तेल के प्रकोप को कम करने के लिए मैलाथियान नामक कीटनाशक का 1 मिली लीटर प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए.

गेहूं, मटर व चने की फसलों को बीमारियों से बचाने के लिए बिजाई से पहले बीज का वीटावैक्स / वैविस्टीन 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज से उपचार करें. गोभी व प्याज की पनीरी में कमरतोड़ रोग की रोकथाम हेतु क्यारियों को वैविस्टीन 10 ग्राम व प्रति 10 लीटर पानी में 25 ग्राम डाईथेन एम-45 का घोल बनाकर सींचें.

पशुधन
पशुओं में ठंड के मौसम में होने वाले रोगों की रोकथाम और प्रबंधन से संबंधित कार्य को पशुपालक सुनिश्चित करें. देखा जाए तो इस मौसम में फेफड़ों वसन तंत्र तथा चमड़ी के रोग अधिक होते हैं. घातक संक्रामक रोग जैसे पी. पी. आर. इस समय सिरमौर जिला में सम्भावित भेड़ और बकरी पॉक्स, इस समय किन्नौर जिला में संभावित गलघोंटू रोग,शिमला में खुरपका और मुंहपका रोग होते हैं. पशुपालक जानवरों में बीमारी के किसी भी लक्षण जैसे भूख न लगना या कम होना, तेज बुखार की स्थिति में तुरंत पशु चिकित्सक की सलाह लें. इस समय फेशियोला एवं एम्फीस्टोम नामक फीता कृमियों के संक्रमण को नजरअंदाज न करें.

ठंड में ऐसे रखें पशुओं का ध्यान
पहाड़ी क्षेत्रों में जानवरों को ठंड से बचाने के लिए उचित उपाय करें तथा पशुओं को पीने के लिए साफ गुनगुना पानी दें. पशुओं की विकास दर ठीक रखने के लिए प्रोटीन, विटामिन और खनिज युक्त संतुलित आहार दें. पशुओं में खनिज की कमी से बचने के लिए पशुओं को नमक चटाएं.

मछली पालन किसानों को सलाह दी जाती है कि तापमान में कमी के साथ मछली का फीड सेवन कम हो जाता है. इसलिए, तापमान के आधार पर खिलाने की दर को 50-75 प्रतिशत तक कम करना आवश्यक है. उचित जल निकासी और ताजे पानी की प्रचुरता होना बहुत महत्वपूर्ण है.

मुर्गियों के लिए अधिक ऊर्जा देने वाला दाना मिश्रण देना आवश्यक है. खरगोशों में प्रजनन न करवाएं, क्योंकि सर्दियों में मुर्गियों के बच्चों की मृत्यु दर बढ़ जाती है.

इस संदर्भ में किसान अधिक जानकारी के लिए कृषि विज्ञान केन्द्र से संपर्क बनाए रखें. इसके अलावा किसान कृषि तकनीकी सूचना केन्द्र के नंबर 01894-230395/1800-180-1551 से भी सम्पर्क कर सकते हैं.

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Neha Sharma
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